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खुद से बात (2) उस मंज़िल पर वो रास्ता ही मेरा हमसफर था। दूर तक तन्हा, बस जाता हुआ ही दिखाई पड़ता था। अन्तरिम छोर पर पहुँच लगता था कि अब मुड़ेगा, मगर उसका अन्तरिम, नहीं था। सीधा, सपाट , दूर तक, वह बस एक रास्ता भर ही था। कभी धूप में तपिश सा लगता, बरसात में यूँ ही भीगता रहता, और ठंड, ठंड में यूँ लगता था जैसे सिकुड़ जाता हो वो कभी-कभी। अजीब दास्तां थी उस रास्ते की। कहने को सम्मुख ही था — एक खुली किताब की तरह। मगर कहीं दिल को छूने से पहले ही — पत्थर सा बन जाता था। मूक, निशब्द, भावों से परे। कुछ भी कहो लेकिन मैंने उस रास्ते को देर से बहुत दूर तलक अपनी ही मंज़िल की तरफ जाते हुए पाया था। रजनी अरोड़ा